Dayanand Saraswati Essay Writer

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (१८२४-१८८३) आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक व देशभक्त थे। उनका बचपन का नाम 'मूलशंकर'[2] था।

उन्होंने ने 1874 में एक महान आर्य सुधारक संगठन - आर्य समाज की स्थापना की। वे एक संन्यासी तथा एक महान चिंतक थे। उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। स्वामीजी ने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा सन्यास को अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया। उन्होने ही सबसे पहले १८७६ में 'स्वराज्य' का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया।

स्वामी दयानन्द के विचारों से प्रभावित महापुरुषों की संख्या असंख्य है, इनमें प्रमुख नाम हैं- मादाम भिकाजी कामा, पण्डित लेखराम आर्य, स्वामी श्रद्धानन्द, पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी, श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, मदनलाल ढींगरा, राम प्रसाद 'बिस्मिल', महादेव गोविंद रानडे, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय इत्यादि। स्वामी दयानन्द के प्रमुख अनुयायियों में लाला हंसराज ने १८८६ में लाहौर में 'दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज' की स्थापना की तथा स्वामी श्रद्धानन्द ने १९०१ में हरिद्वार के निकट कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की।

प्रारम्भिक जीवन[संपादित करें]

दयानंद सरस्वती का जन्म १२ फ़रवरी टंकारा में सन् १८२४ में मोरबी (मुम्बई की मोरवी रियासत) के पास काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में हुआ था।[3] उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे। दयानंद सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था और उनका प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। आगे चलकर एक पण्डित बनने के लिए वे संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए।[4][5]

उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया। एक बार शिवरात्रि की घटना है। तब वे बालक ही थे। शिवरात्रि के उस दिन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर में ही रुका हुआ था। सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।

अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे जिससे उनके माता पिता चिन्तित रहने लगे। तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया (१९वीं सदी के आर्यावर्त (भारत) में यह आम प्रथा थी)। लेकिन बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वे १८४६ में सत्य की खोज में निकल पड़े।

महर्षि दयानन्द के हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि की नियति को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा तथा आर्यावर्तीय (भारतीय) जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी। उन्होंने किसी के विरोध तथा निन्दा करने की परवाह किये बिना आर्यावर्त (भारत) के हिन्दू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था।

ज्ञान की खोज[संपादित करें]

फाल्गुन कृष्ण संवत् १८९५ में शिवरात्रि के दिन उनके जीवन में नया मोड़ आया। उन्हें नया बोध हुआ। वे घर से निकल पड़े और यात्रा करते हुए वह गुरु विरजानन्दके पास पहुंचे। गुरुवर ने उन्हें पाणिनीव्याकरण, पातंजल-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा- विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि ईश्वर उनके पुरुषार्थ को सफल करे। उन्होंने अंतिम शिक्षा दी -मनुष्यकृत ग्रंथों में ईश्वर और ऋषियों की निंदा है, ऋषिकृत ग्रंथों में नहीं। वेद प्रमाण हैं। इस कसौटी को हाथ से न छोड़ना।वर्तमान में केवल पांडुरंग शास्त्री उनमें से एक है जो आर्य समाज की तरह काम कर रही है।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात[संपादित करें]

महर्षि दयानन्द ने अनेक स्थानों की यात्रा की। उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर 'पाखण्ड खण्डिनी पताका' फहराई। उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए। वे कलकत्ता में बाबू केशवचन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के संपर्क में आए। यहीं से उन्होंने पूरे वस्त्र पहनना तथा आर्यभाषा (हिन्दी) में बोलना व लिखना प्रारंभ किया। यहीं उन्होंने तत्कालीन वाइसराय को कहा था, मैं चाहता हूं विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। परंतु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक-पृथक शिक्षा, अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का व्यवहार पूरा उपकार और अभिप्राय सिद्ध होना कठिन है।

आर्य समाज की स्थापना[संपादित करें]

महर्षि दयानन्द ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् १९३२(सन् १८७५) को गिरगांव मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के लिए है। संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। मैं मानता हूँ कि गीता में कुछ भी गलत नहीं है। इसके अलावा गीता वेदों के खिलाफ नहीं है।

वैचारिक आन्दोलन, शास्त्रार्थ एवं व्याख्यान[संपादित करें]

वेदों को छोड़ कर कोई अन्य धर्मग्रन्थ प्रमाण नहीं है - इस सत्य का प्रचार करने के लिए स्वामी जी ने सारे देश का दौरा करना प्रारंभ किया और जहां-जहां वे गये प्राचीन परंपरा के पंडित और विद्वान उनसे हार मानते गये। संस्कृत भाषा का उन्हें अगाध ज्ञान था। संस्कृत में वे धाराप्रवाह बोलते थे। साथ ही वे प्रचंड तार्किक थे।

उन्होंने ईसाई और मुस्लिम धर्मग्रन्थों का भली-भांति अध्ययन-मन्थन किया था। अतएव अकेले ही उन्होंने तीन-तीन मोर्चों पर संघर्ष आरंभ कर दिया। दो मोर्चे तो ईसाइयत और इस्लाम के थे किंतु तीसरा मोर्चा सनातनधर्मी हिंदुओं का था, जिनसे जूझने में स्वामी जी को अनेक अपमान, कलंक और कष्ट झेलने पड़े। दयानन्द ने बुद्धिवाद की जो मशाल जलायी थी, उसका कोई जवाब नहीं था। वे जो कुछ कह रहे थे, उसका उत्तर न तो मुसलमान दे सकते थे, न ईसाई, न पुराणों पर पलने वाले हिन्दू पण्डित और विद्वान। हिन्दू नवोत्थान अब पूरे प्रकाश में आ गया था और अनेक समझदार लोग मन ही मन अनुभव करने लगे थे कि वास्तव में पौराणिक धर्म की पोंगापंथी में कोई सार नहीं है।

स्वामीजी प्रचलित धर्मों में व्याप्त बुराइयों का कड़ा खण्डन करते थे चाहे वह सनातन धर्म हो या इस्लाम हो या ईसाई धर्म हो। अपने महाग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में स्वामीजी ने सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन किया है। उनके समकालीन सुधारकों से अलग, स्वामीजी का मत शिक्षित वर्ग तक ही सीमित नहीं था अपितु आर्य समाज ने आर्यावर्त (भारत) के साधारण जनमानस को भी अपनी ओर आकर्षित किया।

सन् १८७२ ई. में स्वामी जी कलकत्ता पधारे। वहां देवेन्द्रनाथ ठाकुर और केशवचन्द्र सेन ने उनका बड़ा सत्कार किया। ब्राह्मो समाजियों से उनका विचार-विमर्श भी हुआ किन्तु ईसाइयत से प्रभावित ब्राह्मो समाजी विद्वान पुनर्जन्म और वेद की प्रामाणिकता के विषय में स्वामी से एकमत नहीं हो सके। कहते हैं कलकत्ते में ही केशवचन्द्र सेन ने स्वामी जी को यह सलाह दे डाली कि यदि आप संस्कृत छोड़ कर आर्यभाषा (हिन्दी) में बोलना आरम्भ करें, तो देश का असीम उपकार हो सकता है। तभी से स्वामी जी के व्याख्यानों की भाषा आर्यभाषा (हिन्दी) हो गयी और आर्यभाषी (हिन्दी) प्रान्तों में उन्हे अगणित अनुयायी मिलने लगे। कलकत्ते से स्वामी जी मुम्बई पधारे और वहीं १० अप्रैल १८७५ ई. को उन्होने 'आर्य समाज' की स्थापना की। मुम्बई में उनके साथ प्रार्थना समाज वालों ने भी विचार-विमर्श किया। किन्तु यह समाज तो ब्राह्मो समाज का ही मुम्बई संस्करण था। अतएव स्वामी जी से इस समाज के लोग भी एकमत नहीं हो सके।

मुम्बई से लौट कर स्वामी जी इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) आए। वहां उन्होंने सत्यानुसन्धान के लिए ईसाई, मुसलमान और हिन्दू पण्डितों की एक सभा बुलायी। किन्तु दो दिनों के विचार-विमर्श के बाद भी लोग किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके। इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से स्वामी जी पंजाब गए। पंजाब में उनके प्रति बहुत उत्साह जाग्रत हुआ और सारे प्रान्त में आर्यसमाज की शाखाएं खुलने लगीं। तभी से पंजाब आर्यसमाजियों का प्रधान गढ़ रहा है।

समाज सुधार के कार्य[संपादित करें]

महर्षि दयानन्द ने तत्कालीन समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों और रूढियों-बुराइयों को दूर करने के लिए, निर्भय होकर उन पर आक्रमण किया।[6] वे 'संन्यासी योद्धा' कहलाए। उन्होंने जन्मना जाति का विरोध किया तथा कर्म के आधार वेदानुकूल वर्ण-निर्धारण की बात कही। वे दलितोद्धार के पक्षधर थे। उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा के लिए प्रबल आन्दोलन चलाया। उन्होंने बाल विवाह तथा सती प्रथा का निषेध किया तथा विधवा विवाह का समर्थन किया। उन्होंने ईश्वर को सृष्टि का निमित्त कारण तथा प्रकृति को अनादि तथा शाश्वत माना। वे तैत्रवाद के समर्थक थे। उनके दार्शनिक विचार वेदानुकूल थे। उन्होंने यह भी माना कि जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं तथा फल भोगने में परतन्त्र हैं। महर्षि दयानन्द सभी धर्मानुयायियों को एक मंच पर लाकर एकता स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील थे। उन्होंने इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) दरबार के समय १८७८ में ऐसा प्रयास किया था। उनके अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश, संस्कार विधि और ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में उनके मौलिक विचार सुस्पष्ट रूप में प्राप्य हैं। वे योगी थे तथा प्राणायाम पर उनका विशेष बल था। वे सामाजिक पुनर्गठन में सभी वर्णों तथा स्त्रियों की भागीदारी के पक्षधर थे। राष्ट्रीय जागरण की दिशा में उन्होंने सामाजिक क्रान्ति तथा आध्यात्मिक पुनरुत्थान के मार्ग को अपनाया। उनकी शिक्षा सम्बन्धी धारणाओं में प्रदर्शित दूरदर्शिता, देशभक्ति तथा व्यवहारिकता पूर्णतया प्रासंगिक तथा युगानुकूल है। महर्षि दयानन्द समाज सुधारक तथा धार्मिक पुनर्जागरण के प्रवर्तक तो थे ही, वे प्रचण्ड राष्ट्रवादी तथा राजनैतिक आदर्शवादी भी थे। विदेशियों के आर्यावर्त में राज्य होने के कारण आपस की फूट, मतभेद, ब्रह्मचर्य का सेवन न करना, विधान पढना-पढाना व बाल्यावस्था में अस्वयंवरविवाह, विषयासक्ति, मिथ्या भाषावादि, कुलक्षण, वेद-विद्या का प्रचार आदि कुकर्म हैं, जब आपस में भाई-भाई लडते हैं और तभी तीसरा विदेशी आकर पंच बन बैठता है। उन्होंने राज्याध्यक्ष तथा शासन की विभिन्न परिषदों एवं समितियों के लिए आवश्यक योग्यताओं को भी गिनाया है। उन्होंने न्याय की व्यवस्था ऋषि प्रणीत ग्रन्थों के आधार पर किए जाने का पक्ष लिया।

स्वराज्य के प्रथम सन्देशवाहक[संपादित करें]

स्वामी दयानन्द सरस्वती को सामान्यत: केवल आर्य समाज के संस्थापक तथा समाज-सुधारक के रूप में ही जाना जाता है। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिए किये गए प्रयत्नों में उनकी उल्लेखनीय भूमिका की जानकारी बहुत कम लोगों को है। वस्तुस्थिति यह है कि पराधीन आर्यावर्त (भारत) में यह कहने का साहस सम्भवत: सर्वप्रथम स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ही किया था कि "आर्यावर्त (भारत), आर्यावर्तियों (भारतीयों) का है"। हमारे प्रथम स्वतन्त्रता समर, सन् १८५७ की क्रान्ति की सम्पूर्ण योजना भी स्वामी जी के नेतृत्व में ही तैयार की गई थी और वही उसके प्रमुख सूत्रधार भी थे। वे अपने प्रवचनों में श्रोताओं को प्राय: राष्ट्रवाद का उपदेश देते और देश के लिए मर मिटने की भावना भरते थे। १८५५ में हरिद्वार में जब कुम्भ मेला लगा था तो उसमें शामिल होने के लिए स्वामी जी ने आबू पर्वत से हरिद्वार तक पैदल यात्रा की थी। रास्ते में उन्होंने स्थान-स्थान पर प्रवचन किए तथा देशवासियों की नब्ज टटोली। उन्होंने यह अनुभव किया कि लोग अब अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से तंग आ चुके हैं और देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने को आतुर हो उठे हैं।

क्रान्ति की विमर्श[संपादित करें]

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने हरिद्वार पहुँच कर वहां एक पहाड़ी के एकान्त स्थान पर अपना डेरा जमाया। वहीं पर उन्होंने पाँच ऐसे व्यक्तियों से मुलाकात की, जो आगे चलकर सन् १८५७ की क्रान्ति के कर्णधार बने। ये पांच व्यक्ति थे नाना साहेब, अजीमुल्ला खां, बाला साहब, तात्या टोपे तथा बाबू कुंवर सिंह। बातचीत काफी लम्बी चली और यहीं पर यह तय किया गया कि फिरंगी सरकार के विरुद्ध सम्पूर्ण देश में सशस्त्र क्रान्ति के लिए आधारभूमि तैयार की जाए और उसके बाद एक निश्चित दिन सम्पूर्ण देश में एक साथ क्रान्ति का बिगुल बजा दिया जाए। जनसाधारण तथा आर्यावर्तीय (भारतीय) सैनिकों में इस क्रान्ति की आवाज को पहुंचाने के लिए 'रोटी तथा कमल' की भी योजना यहीं तैयार की गई। इस सम्पूर्ण विचार विमर्श में प्रमुख भूमिका स्वामी दयानन्द सरस्वती की ही थी।

विचार विमर्श तथा योजना-निर्धारण के उपरान्त स्वामी जी तो हरिद्वार में ही रुक गए तथा अन्य पांचों राष्ट्रीय नेता योजना को यथार्थ रूप देने के लिए अपने-अपने स्थानों पर चले गए। उनके जाने के बाद स्वामी जी ने अपने कुछ विश्वस्त साधु संन्यासियों से सम्पर्क स्थापित किया और उनका एक गुप्त संगठन बनाया। इस संगठन का मुख्यालय इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) में महरौली स्थित योगमाया मन्दिर में बनाया गया। इस मुख्यालय ने स्वाधीनता समर में उल्लेखनीय भूमिका निभायी। स्वामी जी के नेतृत्व में साधुओं ने भी सम्पूर्ण देश में क्रान्ति का अलख जगाया। वे क्रान्तिकारियों के सन्देश एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाते, उन्हें प्रोत्साहित करते और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं भी हथियार उठाकर अंग्रेजों से संघर्ष करते। सन् १८५७ की क्रान्ति की सम्पूर्ण अवधि में राष्ट्रीय नेता, स्वामी दयानन्द सरस्वती के निरन्तर सम्पर्क में रहे।

स्वतन्त्रता-संघर्ष की असफलता पर भी स्वामी जी निराश नहीं थे। उन्हें तो इस बात का पहले से ही आभास था कि केवल एक बार प्रयत्न करने से ही स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती। इसके लिए तो संघर्ष की लम्बी प्रक्रिया चलानी होगी। हरिद्वार में ही १८५५ की बैठक में बाबू कुंवर सिंह ने जब अपने इस संघर्ष में सफलता की संभावना के बारे में स्वामी जी से पूछा तो उनका बेबाक उत्तर था "स्वतन्त्रता संघर्ष कभी असफल नहीं होता। भारत धीरे-धीरे एक सौ वर्ष में परतन्त्र बना है। अब इसको स्वतन्त्र होने में भी एक सौ वर्ष लग जाएंगे। इस स्वतन्त्रता प्राप्ति में बहुत से अनमोल प्राणों की आहुतियां डाली जाएंगी।" स्वामी जी की यह भविष्यवाणी कितनी सही निकली, इसे बाद की घटनाओं ने प्रमाणित कर दिया। स्वतन्त्रता-संघर्ष की असफलता के बाद जब तात्या टोपे, नाना साहब तथा अन्य राष्ट्रीय नेता स्वामी जी से मिले तो उन्हें भी उन्होंने निराश न होने तथा उचित समय की प्रतीक्षा करने की ही सलाह दी।

१८५७ की क्रान्ति के दो वर्ष बाद स्वामी जी ने स्वामी विरजानन्द को अपना गुरु बनाया और उनसे दीक्षा ली। स्वामी विरजानन्द के आश्रम में रहकर उन्होंने वेदों का अध्ययन किया, उन पर चिन्तन किया और उसके बाद अपने गुरु के निर्देशानुसार वे वैदिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार में जुट गए। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने आर्य समाज की भी स्थापना की और उसके माध्यम से समाज-सुधार के अनेक कार्य किए। छुआछूत, सती प्रथा, बाल विवाह, नर बलि, धार्मिक संकीर्णता तथा अन्धविश्वासों के विरुद्ध उन्होंने जमकर प्रचार किया और विधवा विवाह, धार्मिक उदारता तथा आपसी भाईचारे का उन्होंने समर्थन किया। इन सबके साथ स्वामी जी लोगों में देशभक्ति की भावना भरने से भी कभी नहीं चूकते थे।

प्रारम्भ में अनेक व्यक्तियों ने स्वामी जी के समाज सुधार के कार्यों में विभिन्न प्रकार के विघ्न डाले और उनका विरोध किया। धीरे-धीरे उनके तर्क लोगों की समझ में आने लगे और विरोध कम हुआ। उनकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ने लगी। इससे अंग्रेज अधिकारियों के मन में यह इच्छा उठी कि अगर इन्हें अंग्रेजी सरकार के पक्ष में कर लिया जाए तो सहज ही उनके माध्यम से जनसाधारण में अंग्रेजों को लोकप्रिय बनाया जा सकता है। इससे पूर्व अंग्रेज अधिकारी इसी प्रकार से अन्य कुछ धर्मोपदेशकों तथा धर्माधिकारियों को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर अपनी तरफ मिला चुके थे। उन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती को भी उन्हीं के समान समझा। तद्नुसार एक ईसाई पादरी के माध्यम से स्वामी जी की तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड नार्थब्रुक से मुलाकात करवायी गई। यह मुलाकात मार्च १८७३ में कलकत्ता में हुई।

अंग्रेजों को तीखा जवाब[संपादित करें]

इधर-उधर की कुछ औपचारिक बातों के उपरान्त लॉर्ड नार्थब्रुक ने विनम्रता से अपनी बात स्वामी जी के सामने रखी- "अपने व्याख्यान के प्रारम्भ में आप जो ईश्वर की प्रार्थना करते हैं, क्या उसमें आप अंग्रेजी सरकार के कल्याण की भी प्रार्थना कर सकेंगे।"

गर्वनर जनरल की बात सुनकर स्वामी जी सहज ही सब कुछ समझ गए। उन्हें अंग्रेजी सरकार की बुद्धि पर तरस भी आया, जो उन्हें ठीक तरह नहीं समझ सकी। उन्होंने निर्भीकता और दृढ़ता से गवर्नर जनरल को उत्तर दिया-

मैं ऐसी किसी भी बात को स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी यह स्पष्ट मान्यता है कि राजनीतिक स्तर पर मेरे देशवासियों की निर्बाध प्रगति के लिए तथा संसार की सभ्य जातियों के समुदाय में आर्यावर्त (भारत) को सम्माननीय स्थान प्रदान करने के लिए यह अनिवार्य है कि मेरे देशवासियों को पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो। सर्वशक्तिशाली परमात्मा के समक्ष प्रतिदिन मैं यही प्रार्थना करता हूं कि मेरे देशवासी विदेशी सत्ता के जुए से शीघ्रातिशीघ्र मुक्त हों।

गवर्नर जनरल को स्वामी जी से इस प्रकार के तीखे उत्तर की आशा नहीं थी। मुलाकात तत्काल समाप्त कर दी गई और स्वामी जी वहां से लौट आए। इसके उपरान्त सरकार के गुप्तचर विभाग की स्वामी जी पर तथा उनकी संस्था आर्य-समाज पर गहरी दृष्टि रही। उनकी प्रत्येक गतिविधि और उनके द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का रिकार्ड रखा जाने लगा। आम जनता पर उनके प्रभाव से सरकार को अहसास होने लगा कि यह बागी फकीर और आर्यसमाज किसी भी दिन सरकार के लिए खतरा बन सकते हैं। इसलिए स्वामी जी को समाप्त करने के लिए भी तरह-तरह के षड्यन्त्र रचे जाने लगे।

हत्या का षड्यन्त्र[संपादित करें]

स्वामी जी की मृत्यु जिन परिस्थितियों में हुई, उससे भी यही आभास मिलता है कि उसमें निश्चित ही अग्रेजी सरकार का कोई षड्यन्त्र था। स्वामी जी की मृत्यु ३० अक्टूबर १८८३ को दीपावली के दिन सन्ध्या के समय हुई थी। उन दिनों वे जोधपुर नरेश महाराज जसवन्त सिंह के निमन्त्रण पर जोधपुर गये हुए थे। वहां उनके नित्य ही प्रवचन होते थे। यदाकदा महाराज जसवन्त सिंह भी उनके चरणों में बैठकर वहां उनके प्रवचन सुनते। दो-चार बार स्वामी जी भी राज्य महलों में गए। वहां पर उन्होंने नन्हीं नामक वेश्या का अनावश्यक हस्तक्षेप और महाराज जसवन्त सिंह पर उसका अत्यधिक प्रभाव देखा। स्वामी जी को यह बहुत बुरा लगा। उन्होंने महाराज को इस बारे में समझाया तो उन्होंने विनम्रता से उनकी बात स्वीकार कर ली और नन्हीं से सम्बन्ध तोड़ लिए। इससे नन्हीं स्वामी जी के बहुत अधिक विरुद्ध हो गई। उसने स्वामी जी के रसोइए कलिया उर्फ जगन्नाथ को अपनी तरफ मिला कर उनके दूध में पिसा हुआ कांच डलवा दिया। थोड़ी ही देर बाद स्वामी जी के पास आकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया और उसके लिए क्षमा मांगी। उदार-हृदय स्वामी जी ने उसे राह-खर्च और जीवन-यापन के लिए पांच सौ रुपए देकर वहां से विदा कर दिया ताकि पुलिस उसे परेशान न करे। बाद में जब स्वामी जी को जोधपुर के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां सम्बन्धित चिकित्सक भी शक के दायरे में रहा। उस पर आरोप था कि वह औषधि के नाम पर स्वामी जी को हल्का विष पिलाता रहा। बाद में जब स्वामी जी की तबियत बहुत खराब होने लगी तो उन्हें अजमेर के अस्पताल में लाया गया। मगर तब तक काफी विलम्ब हो चुका था। स्वामी जी को बचाया नहीं जा सका।

इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में आशंका यही है कि वेश्या को उभारने तथा चिकित्सक को बरगलाने का कार्य अंग्रेजी सरकार के इशारे पर किसी अंग्रेज अधिकारी ने ही किया। अन्यथा एक साधारण वेश्या के लिए यह सम्भव नहीं था कि केवल अपने बलबूते पर स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा षड्यन्त्र कर सके। बिना किसी प्रोत्साहन और संरक्षण के चिकित्सक भी ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकता था।

अंतिम शब्द[संपादित करें]

स्वधर्म, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वसंस्कृति और स्वदेशोन्नति के अग्रदूत स्वामी दयानन्द जी का शरीर सन् १८८३ में दीपावली के दिन पंचतत्व में विलीन हो गया और वे अपने पीछे छोड़ गए एक सिद्धान्त, कृण्वन्तो विश्वमार्यम् - अर्थात सारे संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ। उनके अन्तिम शब्द थे - "प्रभु! तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो।"

स्वामी दयानन्द के योगदान के बारे में महापुरुषों के विचार[संपादित करें]

  • डॉ॰ भगवान दास ने कहा था कि स्वामी दयानन्द हिन्दू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता थे।
  • श्रीमती एनी बेसेन्ट का कहना था कि स्वामी दयानन्द पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 'आर्यावर्त (भारत) आर्यावर्तियों (भारतीयों) के लिए' की घोषणा की।
  • सरदार पटेल के अनुसार भारत की स्वतन्त्रता की नींव वास्तव में स्वामी दयानन्द ने डाली थी।
  • पट्टाभि सीतारमैया का विचार था कि गाँधी जी राष्ट्रपिता हैं, पर स्वामी दयानन्द राष्ट्र–पितामह हैं।
  • फ्रेंच लेखक रोमां रोलां के अनुसार स्वामी दयानन्द राष्ट्रीय भावना और जन-जागृति को क्रियात्मक रूप देने में प्रयत्नशील थे।
  • अन्य फ्रेंच लेखक रिचर्ड का कहना था कि ऋषि दयानन्द का प्रादुर्भाव लोगों को कारागार से मुक्त कराने और जाति बन्धन तोड़ने के लिए हुआ था। उनका आदर्श है- आर्यावर्त ! उठ, जाग, आगे बढ़। समय आ गया है, नये युग में प्रवेश कर।
  • स्वामी जी को लोकमान्य तिलक ने "स्वराज्य और स्वदेशी का सर्वप्रथम मन्त्र प्रदान करने वाले जाज्व्लयमान नक्षत्र थे दयानन्द "
  • नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने "आधुनिक भारत का आद्यनिर्माता" माना।
  • अमरीका की मदाम ब्लेवेट्स्की ने "आदि शंकराचार्य के बाद "बुराई पर सबसे निर्भीक प्रहारक" माना।
  • सैयद अहमद खां के शब्दों में "स्वामी जी ऐसे विद्वान और श्रेष्ठ व्यक्ति थे, जिनका अन्य मतावलम्बी भी सम्मान करते थे।"
  • वीर सावरकर  ने कहा महर्षि दयानन्द स्वाधीनता संग्राम के सर्वप्रथम योद्धा थे |
  • लाला लाजपत राय ने कहा - स्वामी दयानन्द मेरे  गुरु हैं। उन्होंने हमे स्वतंत्र विचारना, बोलना और कर्त्तव्यपालन करना सिखाया। 

लेखन व साहित्य[संपादित करें]

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कई धार्मिक व सामाजिक पुस्तकें अपनी जीवन काल में लिखीं। प्रारम्भिक पुस्तकें संस्कृत में थीं, किन्तु समय के साथ उन्होंने कई पुस्तकों को आर्यभाषा (हिन्दी) में भी लिखा, क्योंकि आर्यभाषा की पहुँच संस्कृत से अधिक थी। हिन्दी को उन्होंने 'आर्यभाषा' का नाम दिया था।[7] उत्तम लेखन के लिए आर्यभाषा का प्रयोग करने वाले स्वामी दयानन्द अग्रणी व प्रारम्भिक व्यक्ति थे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती की मुख्य कृतियाँ निम्नलिखित हैं-

  • संस्कारविधि
  • पंचमहायज्ञविधि
  • आर्याभिविनय
  • गोकरुणानिधि
  • आर्योद्देश्यरत्नमाला
  • भ्रान्तिनिवारण
  • अष्टाध्यायीभाष्य
  • वेदांगप्रकाश
  • संस्कृतवाक्यप्रबोध
  • व्यवहारभानु

आर्योद्देश्यरत्नमाला[संपादित करें]

मुख्य लेख : आर्योद्देश्यरत्नमाला

१८७३ में आर्योद्देश्यरत्नमाला नामक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें स्वामी जी ने एक सौ शब्दों की परिभाषा वर्णित की है। इनमें से कई शब्द आम बोलचाल में आते हैं पर उनके अर्थ रूढ हो गए हैं, उदाहरण के लिए, ईश्वर, धर्म, कर्म, आदि। इनको परिभाषित करके इनकी व्याख्या इस पुस्तक में है। इस लघु पुस्तिका में ८ पृष्ठ हैं।

गोकरुणानिधि[संपादित करें]

मुख्य लेख : गोकरुणानिधि

१८८१ में स्वामी दयानन्द ने गोकरुणानिधि नामक पुस्तक प्रकाशित की जो कि गोरक्षा आन्दोलन को स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाने का श्रेय भी लेती है। इस पुस्तक में उन्होंने सभी समुदाय के लोगों को अपने प्रतिनिधि सहित गोकृष्यादि रक्षा समिति की सदस्यता लेने को कहा है जिसका उद्देश्य पशु व कृषि की रक्षा है। आधुनिक पर्यावरणवादियों के समान यहाँ विचार व्यक्ति किए गए हैं। इस पुस्तक में समीक्षा, नियम व उपनियम हैं, तथा प्रमुखतः पशुओं को न मार कर उनका पालन करने में होने वाले लाभ वर्णित किए गए हैं।

व्यवहारभानु[संपादित करें]

मुख्य लेख : व्यवहारभानु

वैदिक यन्त्रालय, बनारस द्वारा १८८० में व्यवहारभानु पुस्तक प्रकाशित की गई थी। इसमें धर्मोक्त और उचित व्यवहार के बारे में वर्णन है।

स्वीकारपत्र[संपादित करें]

मुख्य लेख : स्वीकारपत्र

२७ फ़रवरी १८८३ को उदयपुर में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने एक स्वीकारपत्र प्रकाशित किया था जिसमें उन्होंने अपनी मृत्योपरान्त २३ व्यक्तियों को परोपकारिणी सभा की जिम्मेदारी सौंपी थी जो कि उनके बाद उनका काम आगे बढ़ा सकें। इनमें महादेव गोविन्द रानडे का भी नाम है[8]। इस स्वीकारपत्र पर १३ गणमान्य व्यक्तियों के साक्षी के रूप में हस्ताक्षर हैं। इसके प्रकाशन के कुछ छः माह पश्चात ही उनका देहान्त हो गया था।

संस्कृतवाक्यप्रबोधः[संपादित करें]

यह संस्कृत सिखाने वाली लघु वार्तालाप पुस्तिका है। विभिन्न विषयों पर लघु वाक्य संस्कृत में दिये गये हैं। उनके अर्थ भी हिन्दी में दिए हैं।

सम्पूर्ण ग्रन्थ यहाँ या यहाँ पढ़ें।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. ↑सन्दर्भ त्रुटि: का गलत प्रयोग; नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  2. ↑Madhur Athaiya (1971). Swami Dayanand Saraswati. National Council of Educational Research and Training. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-5048-418-0. https://books.google.com/books?id=aFhvBQAAQBAJ. 
  3. ↑"दयानंद सरस्वती" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). रिफ़रेंसइंडियानेटज़ोन.कॉम. http://www.aspiringindia.org/saints_sages/dayananda_sarswati. अभिगमन तिथि: 2007. 
  4. ↑Sinhal, Meenu (2009). Swami Dayanand Saraswati. प्रभात प्रकाशन. प॰ 3. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 8184300174. http://books.google.com/books?id=iDPGFxCzc54C&printsec=frontcover&dq=Dayananda+Sarasvati+%28Swami%29+-inauthor:%22Dayananda+Sarasvati+%28Swami%29%22&lr=&cd=11#v=onepage&q=&f=false. 
  5. ↑Garg, Ganga Ram (1986). "1. Life and Teachings". World Perspectives on Swami Dayananda Saraswati. Concept Publishing Company. प॰ 4. http://books.google.com/books?id=Siv6V1VDX-AC&pg=PR44&dq=Dayananda+Sarasvati+%28Swami%29+-inauthor:%22Dayananda+Sarasvati+%28Swami%29%22&lr=&cd=21#v=onepage&q=Dayananda%20Sarasvati%20%28Swami%29%20-inauthor%3A%22Dayananda%20Sarasvati%20%28Swami%29%22&f=false. 
  6. ↑यथार्थ वर्णव्यवस्था और दलितोद्धार में महर्षि दयानन्द का योगदान
  7. ↑आर्य भाषा के उन्नायक महर्षि दयानन्द – डॉ॰ मधु संधु
  8. ↑स्वीकारपत्र पृष्ठ २
को आर्य समाज में ईश्वर का सर्वोत्तम और उपयुक्त नाम माना जाता है।

This article is about the founder of the Arsha Vidya Gurukulam. For other uses, see Swami Dayananda (disambiguation).

Swami Dayananda Saraswati (15 August 1930 – 23 September 2015) was a monk of the Hindu monastic order and a renowned traditional teacher of Advaita Vedanta, and founder of the Arsha Vidya Gurukulam. He was the spiritual Guru of prime minister Narendra Modi.[1][2]

Biography[edit]

Early life[edit]

Swamiji was born as Natarajan in Manjakudi – Thiruvarur district of Tamil Nadu on 15 August 1930 [3] to Shri. Gopala Iyer and Smt. Vallambal (or Valliyambal). He was the eldest of four sons. His early schooling was done in the District Board School at Kodavasal.[4] His father's death when he was eight, meant Natarajan had to shoulder a significant portion of family responsibility along with his education. After the completion of his education, Natarajan came to Chennai (erstwhile Madras) for earning a livelihood. Natarajan worked as a journalist for the weekly magazine Dharmika Hindu (run by T. K. Jagannathacharya) and also for erstwhile Volkart Brothers (now Voltas Limited) for sometime. He also decided to be a fighter pilot at one point and joined the Indian Air Force, but left after six months as he felt suffocated by the regimentation there.[4][5] While in his absence his younger brother MG.Srinivasan took charge of the agricultural fields of the family household and made sure that the family had the income to survive and live peacefully off the income.

Involvement with Chinmaya Mission[edit]

Natarajan became interested in Vedanta (Vedanta known also as Upanishad, is a positional name for the wisdom contained in the end portion of the Vedas, the most ancient body of scriptural and religious knowledge known to humankind) after listening to the public talks of Swami Chinmayananda in the year 1953. He became actively involved with the then newly formed Chinmaya Mission in various roles and he was made its Secretary within the first year of its inception. He attended the Sanskrit classes of P.S. Subramania Iyer, a retired Professor of English. It was Iyer who introduced the mode of chanting the Gita verses that is still followed by Chinmaya Mission centres, Arsha Vidya centres and others as well.[6][7][8]

Swami Chinmayananda instructed Natarajan to set up Chinmaya Mission's Madurai branch which Natarajan was able to fulfill. In 1955 Natarajan accompanied Swami Chinmayananda to Uttarakashi and helped him in the preparation of a Gita manuscript for publication. In Uttarakashi, he met Swami Chinmayananda's Guru, Tapovan Maharaj, who advised him, 'You have a duty to yourself which is also important. Stay here. Do japa, meditate and study.' Natarajan could not take up that offer at that point in time. However, he promised Swami Tapovana Maharaj that he would be able to come after one year and he did. Natarajan returned to Madras and took up the editorship of 'Tyagi,' a fortnightly magazine of Chinmaya Mission. Upon the advice of Swami Chinmayananda, Natarajan shifted to Bengaluru (erstwhile Bangalore) in 1956 and continued to edit Tyagi which was also moved to Bengaluru (erstwhile Bangalore). During his stay there, Natarajan joined the Sanskrit College in Chamrajpet and had the privilege of studying one on one with Prof. Veeraraghavachariar.[4]

Sannyasa[edit]

In 1961, with the permission of Swami Chinmayananda, Natarajan went to study under Swami Pranavananda at Gudivada (near Vijayawada) to clarify many of his doubts on Vedanta and self-enquiry. The stay with Swami Pranavananda helped Natarajan learn one thing clearly – that Vedanta is a pramana (means of knowledge) to know the truth of the Self. In Natarajan's own words,

I saw the Swami giving direct knowledge to the people he was teaching. This resolved all my conflicts. My problems with Vedanta had been my mistaken notion that it was a system.[4]

This critical shift in his vision about Vedanta impelled Natarajan to once again study the sastra with Sankara's commentaries. In 1962 he was given Sanyasa by Swami Chinmayananda and was given the name Swami Dayananda Saraswati.[5] In 1963 he went to Mumbai, (erstwhile Bombay) to the newly inaugurated Sandeepany Sadhanalaya of Chinmaya Mission, where he undertook the responsibility of editing the magazine of the mission Tapovan Prasad. In addition, Swami Dayananda taught chanting of the Bhagavad Gita and the Upanishads to the students of Sandeepany.

In November 1963 Swami Dayananda undertook a study-pilgrimage to Rishikesh and stayed in a grass hut in Purani Jhadi now known as Dayananda Nagar. He spent three years there, studying Brahma Sutras under Swami Tarananda Giri at the Kailash Ashram.[9]

Public talks[edit]

Around 1967, due to the declining health of Swami Chinmayananda, the Mission approached Swami Dayananda to give public talks and lectures. Accordingly, between 1967 and 1970, Swami Dayananda travelled to different towns and cities in India spreading the teachings of Gita and the Upanishads.

In 1971, Swami Dayananda agreed to conduct a long-term study program at Sandeepany Sadhanalaya, Powai, Mumbai and formulated a curriculum that would systematically unfold the vision of Vedanta. Between 1972 and 1979, Swami Dayananda conducted two three-year residential Vedanta courses in Mumbai. In his words, 'At Sandeepany the teaching is traditional and rigorous. What would take a Sadhu in the Himalayas nine years to learn, the students at Sandeepany learned in two-and-half years.'[4][5]

Arsha Vidya Gurukulam[edit]

At the request of students in the United States, in 1979 Swami Dayananda established a three-year study program at Sandeepany West in Piercy, California. In 1982, he returned to India and continued to spread the message of the Upanishads through public talks and lectures. Responding to the request of students, devotees and disciples, Swami Dayananda established the [Arsha Vidya Gurukulam] at Saylorsburg, Pennsylvania in 1986 wherein a three-year residential course was completed in 1990.[10][11]

Arsha Vidya Centers[edit]

Teaching[edit]

Swami Dayananda along with his students has taught ten three-year programs (eight in India and two in the United States) and many of his students from these programs are now teaching all over India and abroad. More than two-hundred of his Sanyasi-disciples are teaching Vedanta and Paninian grammar around the world.[10][12][13][14][15][16][17][18]

Institutions[edit]

As a teacher of Vedanta, Swami Dayananda has established four traditional teaching centres and many more across the globe through his students with a primary focus on teaching Vedanta, Sanskrit and related disciplines. These traditional teaching centres carry the banner 'Arsha Vidya' or 'Arsha Vidnyana', i.e. Knowledge of the Rishis. The word 'Arsha' has also been used by many of Swami Dayananda's students in naming their facilities to mark their lineage.

The four Arsha Vidya teaching centres that Swami Dayananda has established are:

  • Arsha Vidya Peetham, Swami Dayananda Ashram, Rishikesh 249201, Uttarakhand, India[19]
  • Arsha Vidya Gurukul, P.O. Box 1059, Saylorsburg, Pennsylvania 18353, USA[20]
  • Arsha Vidya Gurukul, Anaikatti, Coimbatore – 641108, Tamil Nadu, India[21]
  • Arsha Vidnyana Gurukul, Amravati Road, Nagpur, Maharashtra, 410 033, India[22]

These residential centres conduct long-term courses, 1–2-week camps, weekend study programs and family camps throughout the year and the subjects taught include the major Upanishads, Bhagavad Gita, several secondary texts of Vedanta and the Brahma Sutras. The study includes also the Sanskrit commentary of Sankara on these texts. Along with these studies, the Sanskrit language is also taught with Paninian grammar. The Gurukulas also conduct sessions of daily meditation and satsangas.[23] Additionally camps are conducted for teaching Yoga, Indian Classical Music, Ayurveda, Jyotisha and allied disciplines.

The teaching centres founded by Swami Dayananda offer Indians and non-Indians, Hindus and non-Hindus, men and women alike, an opportunity to study the profound knowledge of Vedanta. The teaching centres conduct outreach programs to reach out to the public at large. At present there are at least sixty centres[24][25][26] in India and abroad that carry on the tradition of Vedantic teaching under the banner of Arsha Vidya.

Shishyas (Students)[edit]

The most well-known student of Swami Dayananda Saraswati is Narendra Modi, prime minister of India.[27] Other students include Anantanand Rambachan, a professor of religion at St. Olaf College, Minnesota (USA), and Vasudevacharya, previously Dr. Michael Comans, former faculty member in the Department of Indian Studies at the University of Sydney, Swamy Paripoornananda of Sreepeetham and Swami Paramarthananda.[28][note 1]

Other organisations[edit]

All India Movement for Seva[edit]

In addition to teaching, Dayananda has initiated and supported various philanthropic efforts. He founded the All India Movement for Seva (AIM for Seva) in 2000 as an initiative of the Hindu Dharma Acharya Sabha, an apex body of Hindu religious heads of the various sampradayas which itself was convened by Dayananda's co-ordinating efforts.[29]

Inter-religious dialogue[edit]

Dayananda has promoted several inter-religious dialogues.[11] He has participated in Hindu-Jewish conferences facilitated by the World Council of Religious Leaders under that organisations “Religion One on One” initiative.[citation needed] He has also participated in two Hindu-Buddhist summits. The first one organised by the Global Peace Initiative of Women, was held in Phnom Penh, Cambodia in 2009 and the second one was organised in Colombo, Sri Lanka in 2010.[citation needed]

Restoration of Temple Practices and Worship[edit]

Dayananda has promoted the preservation of ancient cultures and religious and spiritual practices of India that have survived several millennia, yet struggle in modern times due to lack of support. He has started several VedaPathashalas (Centers of learning of Vedas) for the preservation of Vedas and Agamas to prevent their rapid extinction due to a lack of infrastructure for learning.[30]

Dayananda also founded the Dharma Rakshana Samiti,[31] a body to protect the Vedic heritage, to preserve the native spiritual culture of India inherited from the rishis and to raise the awareness among Hindus of their Vedic heritage.[30]

Dayananda had appointed 35 oduvars in ancient Siva temples and paid them monthly allowance to sing the Panniru Tirumurai, songs explaining Saiva Siddhanta philosophy.

Dayananda was instrumental in building five chariots for Sri Mahalingaswamy Temple at Tiruvidaimarudur near Kumbakonam in 2010.

Sri Dayananda Saraswati brought various monks and matathipatis across India under one umbrella called Hindu Dharma Acharya Sabha. The Sabha was a conclave of various sanyasins belonging to various samprathayas i.e. traditions. It was the first time ever that such a large number of Sanyasis were brought under one organisation.

Sri Dayananda Saraswati filed a Writ Petition (W.P. 476/2012) before the Supreme Court of India challenging the Constitutional validity of various provisions of the Hindu Religious Endowments and Institutions Acts of Tamil Nadu, Andhra Pradesh and Pondicherry. This matter is now pending before the Supreme Court. He was instrumental in getting Dr. Subramanian Swamy defend and protect Ram Sethu when the Union Government wanted to create a channel breaking it. He was also instrumental in getting Dr. Subramanian Swamy implead in the Chidambaram Temple Case in the year 2009. Though the Podu Dikshitars and Dr. Subramanian Swamy lost their case in the Chidambaram Temple matter before the Madras High Court in 2009, their appeals were allowed by the Supreme Court which by its judgment dated 06-Jan-2014 threw the Government out of the Chidambaram Sri Natarajar Temple by setting aside the judgments passed by the Madras High Court in the year 2009. The Supreme Court's Judgment in the Chidambaram Temple Case came as a big boost for retrieving Hindu temples from Government control.

Publications: Books, CDs and DVDs[edit]

Many of Swami Dayananda Saraswati's lectures, talks and discourses have been published in the form of books. These books deal with Vedantic teachings and their applicability to various situations in life. Many of his teachings are also available in audio and video formats. A non-exhaustive list of his books follows.[32]

Bhagavad Gita Home Study Program[edit]

The Bhagavad Gita Home Study (BGHS) Course designed by Swami Dayananda presents the teaching of Bhagavad Gita.[33] and in many other countries including Argentina, Australia, Brazil India, Japan, Malaysia, Singapore and the United Kingdom.

List of Books Authored by Swami Dayananda[edit]

(in alphabetical order)

  1. Action and Reaction
  2. Bhagavada Geeta Home Study (considered his magnum opus, running into 3,000 pages, now in its 4th edition)
  3. Can We? (Essays: 6)
  4. Compositions
  5. Conversion Is Violence
  6. Crisis Management
  7. Danam (Essays: 4)
  8. Dialogues With Swami Dayananda
  9. Discourses on Important Topics
  10. Discovering Love
  11. Do all Religions have the same goal? (Essays: 1)
  12. Eight Significant Verses of Bhagavad Gita
  13. Exploring Vedanta (Shraddha- Bhakti-dhyana-yogad avaihi & Atmanam ced vidnyaniyat)
  14. Freedom
  15. Freedom from Fear
  16. Freedom from Helplessness
  17. Freedom from Sadness
  18. Freedom from Stress
  19. Freedom in Relationship
  20. Friendship (The Essence of Vedic Marriage)
  21. Fundamental Problem, The
  22. Gurupurnima (Essays: 3)
  23. In the Vision of Vedanta
  24. Insights
  25. Introduction to Vedanta – Understanding The Fundamental Problem
  26. Japa
  27. Kenopanishad
  28. Knowledge and Action – The Two Fold Commitment
  29. Living Intelligently
  30. Living Versus Getting On
  31. Mahavakya Vichara
  32. Mandukya Upanishad
  33. Moments with Krishna (Essays: 7)
  34. Morning Meditation Prayers
  35. Mundakopanishad – (2 Vol. Set) Bhasya and Tika unfolded
  36. Need for Cognitive Change
  37. Need for Personal Reorganisation
  38. Om Namo Bhagavate Vasudevaya
  39. Personal Re-engineering in Management
  40. Personnel Management
  41. Prayer Guide
  42. Problem Is You, The Solution Is You, The
  43. Public Talks-2: Discovering Love & Successful Living
  44. Purnamadah Purnamidam
  45. Purpose of Prayer, The
  46. Ramayana
  47. Sadhana and the Sadhya, The
  48. Sadhana Pancakam
  49. Satyam and Mithya
  50. Self-Knowledge
  51. Shri Rudra
  52. Stressfree Living
  53. Successful Living
  54. Surrender and Freedom
  55. Talks and Essays (Vol.I)
  56. Talks and Essays (Vol.II) of
  57. Talks on "Who Am I ?"
  58. Talks on Meditation
  59. Talks on Shri Rudra
  60. Tattvabodha
  61. Teaching of the Bhagavad Gita, The
  62. Teaching Tradition of Advaita Vedanta
  63. Ten Essential Verses of Bhagavad Gita
  64. Understanding Between Parents and Children
  65. Value of Values, The
  66. Vedanta 24 x 7
  67. Vedic View and Way of Life
  68. Vishnusahasranama (with translation and commentary)
  69. Vivekachudamani (Talks on 108 Selected Verses)
  70. Wedding Ceremony Based on Hindu Concepts
  71. What is Meditation? Meditation Series: 2
  72. What You Love Is The Pleased Self
  73. Yoga of Objectivity
  74. You Are the Whole

See also[edit]

Notes[edit]

References[edit]

  1. ^"PM Narendra Modi's Spiritual Guru Swami Dayanand Dies at 87". NDTV. September 24, 2015. 
  2. ^"PM Narendra Modi Says His Spiritual Guru Swami Dayanand Saraswati's Death Is A 'Personal Loss'". Huffington Post. September 24, 2015. 
  3. ^Dialogues with Swami Dayananda, Sri Gangadhareswar Trust, 1988
  4. ^ abcdeSwami Dayananda Saraswati: His Life and Work. Arsha Vidya Newsletter, pp. 13–16, Arsha Vidya Gurukulam, Anaikatti, Coimbatore. August 2009 [1].
  5. ^ abcGlimpses of Swami Dayananda Saraswati's life. Arsha Adhyayan Kendra, Bhuj, Gujarat, INDIA. Video commemorating Swami Dayananda's 7 December 2008 visit to Bhuj on YouTube
  6. ^"Gita Chanting by Swami Brahmananda". Youtube.com. Retrieved 17 February 2013. 
  7. ^"Gita Chanting by Swami Paramarthananda". Youtube.com. 23 December 2009. Retrieved 17 February 2013. 
  8. ^"Swami Sandeep Chaitanya's Gita Yagnam". Youtube.com. 20 December 2007. Retrieved 17 February 2013. 
  9. ^kailasaahram.com
  10. ^ abDayananda Saraswati; Mala Mukherjee; Padma Narasimhan (1990). Swami Dayananda Saraswati: The traditional teacher of Brahma vidya. Chennai, India: T.T. Maps & Publications. ISBN 81 7053 103 9. 
  11. ^ abSheela Balaji (2011). Swami Dayananda Saraswati (Contributions & Writings). Chennai, India: Arsha Vidya Research and Publication Trust. ISBN 978 93 80049 46 5. 
  12. ^Saraswati, Swami Dayananda (2010). Handbook of Arsha Vidya Sanyasi Disciples. Anaikatti, Coimbatore, India: Sruti Seva Trust. 
  13. ^"Arsha Vidya Teachers". 
  14. ^"Adhyatma Vidya Mandir". 
  15. ^"Vedanta Vidyarthi Sangha". 
  16. ^"Arsha Bodha Center". 
  17. ^"Arsha Vidya Center". 
  18. ^"Vidyamandir-Brazil". 
  19. ^"dayananda.org". dayananda.org. Retrieved 17 February 2013. 
  20. ^"arshavidya.org". arshavidya.org. Retrieved 17 February 2013. 
  21. ^"arshavidya.in". arshavidya.in. Retrieved 17 February 2013. 
  22. ^"arshavidya-nagpur.org". arshavidya-nagpur.org. Retrieved 17 February 2013. 
  23. ^"Friends of AVG at Saylorsburg". 
  24. ^"Disciples Website". 
  25. ^"Swamini Vilasananda, Argentina". 
  26. ^"Br.Chetana, Tokyo, Japan". 
  27. ^"PM Narendra Modi Says Swami Dayanand Giri's Death Is A 'Personal Loss'". The Huffington Post. Retrieved 2015-09-24. 
  28. ^Sri Vasudevacharya (previously Dr Michael Comans)Archived 28 June 2015 at the Wayback Machine.
  29. ^"All India Movement for Seva". 
  30. ^ abSwaminathan, V (15 August 2010). "An interview with Pujya Swami Dayananda Saraswati". Arsha Vidya Gurukulam, 24th Anniversary Souvenir: 23–48. 
  31. ^"dharmarakshanasamiti.org". dharmarakshanasamiti.org. 2 September 2010. Retrieved 17 February 2013. 
  32. ^"Arsha Vidya Gurukulam Bookstore". 
  33. ^"Bhagavad Gita Home Study Groups". 

External links[edit]

  1. ^See also Advaitapratibodhah, "Awakening to nonduality," a short treatise in classical style by Michael Comans.

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